ज्ञान साधना का विरोधी नहीं है। वह तो उसमें रहने वाले अज्ञानमात्र का ही विरोधी है। अज्ञान का नाश करके साधनाओं के स्वरूप की रक्षा करने में ज्ञान का जो महत्त्व है, वह कोई अनुभवी महापुरुष ही जान सकता है। इसलिये जैसे दूसरे साधकों के द्वारा प्रयत्नपूर्वक साधनायें होती हैं, वैसे ही ज्ञानी के शरीर से भी सहज रूप में हुआ करती हैं। प्रमाद और आलस्य तो अज्ञान के कार्य हैं, जो आदर्श महात्मा में रह ही नहीं सकते। इसीसे ज्ञान के पूर्वकाल में उन्हें जिन साधनों का अभ्यास हो जाता है, उन्हीं का शरीर के त्याग पर्यन्त सदा अनुष्ठान होता रहता है।